1 ईसा पूर्व में कितने वर्ष होते हैं? जानें समय की गणना, इतिहास और इसका महत्व

स्कूल के बच्चों में इतिहास विषय को पढ़ते समय यह जानने की जिज्ञासा प्रबल होती है कि यह ईस्वी और ईसा पूर्व का क्या मतलब होता है हालांकि उन्हें फुल फॉर्म बता दिया जाता है लेकिन वह इसका मतलब नहीं समझ पाते हैं। मानव सभ्यता के विकास में समय गणना एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है यह हमे बताता है कि एक ही काल खंड में दुनिया के अलग अलग जगहों पर अनेकों सभ्यताएं विकसित हुई हैं।

1 BCE year calculation and historical significance explained

ईस्वी (AD) और ईसा पूर्व (BC) का महत्त्व ऐतिहासिक धरोहरों को समझने के लिए किया जाता है क्या आप जानते हैं कि कब से इनकी शुरूवात हुई? इस ब्लॉग में ईस्वी, ईसा पूर्व और इतिहास में समय की गणना की जाती है साथ ही जानेंगे इससे जुड़े रोचक तथ्यों के बारे में।

समय की गणना व उसके महत्त्व 

जब हम अतीत की घटनाओं पर बात करते हैं तो उसके काल खंड  की बात जरूर करते हैं लेकिन बात जब ऐतिहासिक घटनाओं की होती है तब ईस्वी और ईसा पूर्व का प्रयोग किया जाता है क्योंकि इतिहास को समय के आधार पर बांटा गया है पूरे विश्व में अनेक सभ्यताओं का उदय, धार्मिक व सामाजिक आंदोलनो को वर्तमान के संदर्भ में समझने के लिए मानकों का तय करना अत्यंत आवश्यक था।

Time calculation and its significance in history

  • 1 ईसा पूर्व इतिहास को व्यवस्थित समझने के लिए एक मील का पत्थर साबित हुआ है जो वर्तमान अतीत और भविष्य को जोड़ने में सहायक है इससे जुड़े कुछ ऐतिहासिक महत्व।
  • तिथियों और घटनाओं के कलानुक्रम को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है जैसे कि फ्रांस की क्रांति और अमेरिका या रूस की क्रांति के समय का अंतराल।
  • सभ्यताओं और साम्राज्य के उदय और पतन तथा उसके विस्तार के बारे में वर्णन।
  • एक घटना का दूसरी घटना के साथ तुलनात्मक अध्ययन करना आसान हो जाता है।
  • इतिहास की घटनाओं का विभाजन करने में आसानी होती है जैसे मौर्य काल के पहले नन्द वंश था या उसके बाद शुंग वंश था यह जान पाना समय गणना से ही संभव हो पाया है।
  • घटनाओं के विश्लेषण में आसानी के साथ ही पूरे विश्व का तुलनात्मक अध्ययन करना आसान है बतौर उदाहरण भारत की हड़प्पा सभ्यता और मिस्र की सभ्यता की तुलना।

समय की गणना करने वाले पश्चिमी देशों के कलेंडर

पश्चिमी देशों में समय परिवर्तन होने साथ अनेकों कैलेंडर आए और बाद में त्रुटियां होने पर बंद भी किए गए आइए कुछ कैलेंडर के विषय में जानते हैं।

Western countries' calendar for time calculation

  • जुलियस सीजर द्वारा प्रस्तावित जूलियन कैलेंडर की शुरुआत 45 ईसा पूर्व हुई थी इसका 1 वर्ष 365.25 दिन का होता था और समय के साथ वर्ष में दिनों की वृद्धि की वजह से खगोलीय समय सही माप नहीं पाया और अंततः इसका प्रचलन बंद हुआ।
  • जूलियन कैलेंडर की त्रुटि को सुधार कर 8वें पोप द्वारा ग्रगेरियन कैलेंडर को 1582 में मान्यता दी गई और यह वर्तमान में अंतराष्ट्रीय स्तर पर प्रचलित है आज इस आधुनिक जमाने में लगभग हर देश इसी का इस्तेमाल करता है।
  • प्राचीन रोम में रोमन कैलेंडर का इस्तेमाल होता था जिसमें 304 या 10 महीनों का एक वर्ष होता था लेकिन खगोलीय घटनाएं इससे मेल न खाने की वजह से कई बार इसे बदला गया।
  • यहूदियों द्वारा हेब्रू कैलेंडर का इस्तेमाल होता था जो जिसमें वर्ष की शुरुआत त्योहारों और ऋतुओं द्वारा होती थी।
  • पश्चिमी यूरोप में मायन कैलेंडर बहुत प्रचलित था जो लंबे समय की घटनाओं के आंकलन के लिए जाना जाता था।
  • जर्मन और रोमान द्वारा एंग्लो सैक्शन कैलेंडर बनाया गया लेकिन आगे चलकर इसकी जगह जूलियन कैलेंडर ने ले ली।
  • Anno Domini System मतलब ईसा के जन्म के 525 ईसा शताब्दी में प्रचलन में आया इसी के बाद से ही BC और AD प्रचलन में आया, ऐतिहासिक घटनाओं के वर्णन के लिए वर्तमान में यह सबसे ज्यादा प्रचलित कैलेंडर है।

भारतीय परम्परा के कुछ कैलेंडर

भारतीयों द्वारा धार्मिक, सांस्कृतिक व खगोलीय घटनाओं पर कुछ प्रचलित कैलेंडर इस प्रकार हैं।

Indian calendar for time calculation

  • 57 ईसा पूर्व में प्रतापी राजा विक्रमादित्य सिंहासन पर बैठे थे इसी उपलक्ष्य में विक्रम संवत के नाम से कैलेंडर का निर्माण किया गया। यह उत्तर भारत का में काफी प्रचलित है साल में 12 मास होते हैं यह पूरी तरह चंद्रमा और सूर्य की गतिविधिक घटनाओं पर आधारित है।
  • भारत के सरकारी काम काज शक संवत कैलेंडर पर आधारित है भारत सरकार ने इसे 1957 से मान्यता दी है यह 78 ईस्वी में कुषाण वंश के राजा कनिष्क द्वारा संचालित किया गया, इसमें 12 महीने होते हैं और साल की शुरुआत चैत्र माह से होती है।
  • धार्मिक अनुष्ठान, त्यौहार, तिथि, मुहूर्त या ग्रहों की नक्षत्र दशा देखने के लिए पुरातन काल से हिन्दू पंचांग का प्रयोग होता आया है।
  • बंगाली कलेंडर की शुरुआत 6वी शताब्दी में हुई थी इसमें साल में 12 मास और साल की शुरुआत अप्रैल माह से होती है।
  • तमिल, मलयालम के पुरातन कैलेंडर धार्मिक मुहूर्त और त्योहारों के सटीक आंकलन करने में मदद करते हैं वहीं शिक्ख धर्म में नानकशाही कैलेंडर और बौद्धों के लिए बुद्ध के महापरिनिर्वाण को आधार बनाकर बुद्ध कैलेंडर का निर्माण किया।
  • हिंदू वेदों पुराणों में समय मापन की अनेकों विधियां है जैसे चार युगों (सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलयुग) के समय का आंकलन और कौन सा गृह कितनी दूरी पर है यह श्लोकों के माध्यम से वर्णित है।

1 ईसा पूर्व में कितने वर्ष होते हैं

एक ईसा पूर्व अथवा अंग्रेजी में BC (Before Christ) अर्थात ईसा मसीह के जन्म के पहले के सालों को ईसापूर्व से संबोधित करते हैं वर्तमान में समय और वर्ष की गणना के लिए इसी का प्रयोग किया जाता है।

1 BCE या ईसा पूर्व में एक ही वर्ष होगा यह जीजस क्राइस्ट के पैदा होने के जस्ट पहले का साल है उसके बाद AD की शुरुआत हो जाती है।

Years in 1 BCE

  • बतौर उदाहरण हमारा भारत अंग्रेजों की गुलामी से सन 1947 में आजाद हुआ था तो सन 1 से यह घटना 1947 साल बाद हुई है।
  • सन 1 के पहले 0 का कोई कांसेप्ट नहीं है सीधे तौर पर इसके पहले की घटनाओं की बात ईसा पूर्व कहकर ही लिखा जाएगा इस प्रकार से एक ईसा पूर्व में एक साल ही होगा।
  • मौर्य वंश , नंद राजवंश और गुप्त राजवंश का शासन ईसा के पूर्व में था।
  • भारत में सन 1वीं से लेकर 3वीं शताब्दी तक कुषाण वंश का शासन था।
  • 1 वीं बौद्ध और जैन धर्म का विस्तार हो रहा था और इनकी उत्पत्ति ईसा से 500 से 600 साल पूर्व की है।
  • BC को एक अन्य नाम (Before Common Era) भी कहते हैं। इसकी गणना हमेशा उल्टे क्रम में होती है।

निष्कर्ष:- 

समय की गणना के लिए सदियों से अनेकों कैलेंडर और विधियों के साथ साथ किसी ने जन्म को लैंडमार्क बना दिया तो किसी ने मृत्यु को बनाया, मानव विकास के साथ परिवर्तन भी होता रहा।

इतिहास में समय की गणना का बहुत महत्व है क्योंकि घटनाओं की क्रमबद्धता और काल खंड पता करने के लिए यह जरूरी है कौन क्या कब और पहले घटित हुआ इसी कड़ी से ही अतीत को खंगाला जा सकता है समय मापन से स्थानीय संस्कृति, राजनैतिक विस्तार का अंदाजा लगाया गया। इस ब्लॉग में समय की गणना और ईसा या ईसा पूर्व के संबंध में महत्वपूर्ण जानकारी दी गई है।

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Amit Mishra

By Amit Mishra

नमस्कार! यह हमारी टीम के खास मेंबर हैं इनके बारे में बात की जाए तो सोशल स्टडीज में मास्टर्स के साथ ही बिजनेस में भी मास्टर्स हैं सालों कई कोचिंग संस्थानों और अखबारी कार्यालयों से नाता रहा है। लेखक को ऐतिहासिक और राजनीतिक समझ के साथ अध्यात्म,दर्शन की गहरी समझ है इनके लेखों से जुड़कर पाठकों की रुचियां जागृत होंगी साथ ही हम वादा करते हैं कि लेखों के माध्यम से अद्वितीय अनुभव होगा।

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